હૂ પલ્લવી.

July 5, 2012

छोटी छोटी जाल की….

Filed under: કવિતા — Pallavi @ 1:27 pm

छोटी  छोटी  जा l की  बूँदें  सागर  को  भर  देती  है 

बालू  की  राज  नन्ही  नन्ही  सुधर  भूमि  रच  देती  है 

क्षण  क्षण  काल  इक़त्था  होकर  लम्बा  युग  बन  जाता  है 

क्षण  को  क्षुद्र  न  समझो  भाई  यह  जग  का  निर्माता  है 

छोटी  छोटी  बनकर  भूले  हमको  बुरा  बनती  है 

नीज  सुधार  के  पथ  से  हमको  कोसों  दूर  हटती  है 

दया  भरे  लघु  काम  हमारे  और  प्रेम  मई  मीठे  बोल 

कर  देते  अपने  जीवन  को  सुख्मै  सुन्दर  अति  अनमोल

Create a free website or blog at WordPress.com.

%d bloggers like this: